दुनिया से तो रोज लड़ते हो, कभी खुद के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत की है ?


आज के समय में हर व्यक्ति किसी न किसी दबाव में जी रहा है। युवाओं के ऊपर कॉलेज का प्रेशर है, करियर बनाने की टेंशन है, और समाज में खुद को साबित करने की होड़ है।

इस भागदौड़ और मानसिक तनाव से तंग आकर जब कोई व्यक्ति अध्यात्म की ओर मुड़ता है, तो उसे वहां एक गहरा सुकून और शांति महसूस होती है। जो उसकी जरुरत है।

 ऐसे में अक्सर मन में यह विचार आता है कि क्यों न इस दुनिया के सारे झंझटों, डर और दबावों को छोड़कर पूरी तरह से आध्यात्मिक संस्था के कार्यों में या गुरु की शरण में समर्पित हो जाया जाए। हमें लगता है कि यह संसार दुखों का घर है और अध्यात्म सुख का सागर है।

लेकिन यहाँ हमें ठहरकर सोचने की ज़रूरत है कि क्या यह सचमुच अध्यात्म के प्रति प्रेम है, या फिर जीवन की ज़िम्मेदारियों और चुनौतियों से भागने का एक बहाना? 

असली अध्यात्म कोई पलायन (Escape) नहीं है। यह समझने के लिए मैं आपको जीवन के इस गहरे मनोवैज्ञानिक सच को 5 व्यावहारिक बिंदुओं में विस्तार से समझाऊंगा।

1. क्या अध्यात्म दुनिया से भागने का रास्ता है?

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आमतौर पर हम अपने मन में दो अलग-अलग दुनिया की छवियां (Images) बना लेते हैं। पहली छवि है बाहरी या सांसारिक दुनिया की—जैसे हमारा कॉलेज, हमारी नौकरी, व्यापार या परिवार।

 हमें लगता है कि इस दुनिया में बहुत ज्यादा परेशानियां ओर दिक्कतें है और हर कदम पर एक भयंकर प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। यहाँ टिके रहने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है और ज़ोर लगाना पड़ता है।

इसके विपरीत, हम अपने दिमाग में अध्यात्म की एक बहुत ही काल्पनिक और रोमांटिक छवि बना लेते हैं। हम सोचते हैं कि अध्यात्म की दुनिया में कदम रखते ही सब कुछ जादुई रूप से ठीक हो जाएगा; वहाँ सिर्फ प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और आनंद ही आनंद होगा।

यही हमारी सबसे बड़ी भूल होती है। वास्तविकता यह है कि दबाव, तनाव और श्रम से आप जीवन के किसी भी क्षेत्र में भागकर नहीं बच सकते। 

यदि आप दुनिया के डर या अपनी नाकामियों से घबराकर अध्यात्म की तरफ आ रहे हैं, तो आप केवल अपनी आँखों पर पट्टी बांध रहे हैं। 

अध्यात्म कोई आरामगाह जगह नहीं है जहाँ जाकर आप हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएं। अध्यात्म में तो संसार से भी कहीं ज्यादा गहरे मानसिक श्रम और संकल्प की आवश्यकता होती है। यहाँ आपको परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने ही शरीर की प्रतिक्रियाओं और मन के विरुद्ध लड़ना पड़ता है।

2. संघर्ष के दो रूप: बाहरी बनाम आंतरिक लड़ाई 

हम लोग सोचते है कि अध्यात्म में कदम रखते ही सीधा स्वर्ग का अनुभव करेंगे। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अध्यात्म में संघर्ष नहीं है; बल्कि सच तो यह है कि वहाँ संघर्ष की गुणवत्ता (Quality) बदल जाती है।

 संसार और अध्यात्म के बीच का असली अंतर केवल इतना है कि संसार में आप दूसरों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करते हैं, जबकि अध्यात्म में आप अपने ही खिलाफ खड़े होते हैं।

सांसारिक स्तर पर आपकी लड़ाई बाहर की दुनिया से होती है। आप किसी नौकरी की रेस में दूसरे उम्मीदवार को पीछे छोड़ना चाहते हैं, या व्यापार में अपने प्रतिद्वंदी को हराकर उससे आगे निकलना चाहते हैं।

दूसरों के दोष देखना, उनकी कमियां निकालना और उनके खिलाफ मोर्चा खोलना हमारे लिए बहुत आसान और स्वाभाविक होता है। इस बाहरी लड़ाई में अगर हम  जीत भी जाएं, तो भी मन का खालीपन और असुरक्षा की भावना कभी खत्म नहीं होती।

इसके विपरीत, अध्यात्म का वास्तविक मतलब है—अपने ही खिलाफ युद्ध की घोषणा करना, अर्थात खुद से ही भिड़ जाना यहाँ आपकी लड़ाई किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं, बल्कि हमारेअपने ही अहंकार (Ego), अपनी पुरानी आदतों,  बंधनों और उन झूठे विश्वासों से होती है जिन्हें हमने सालों से सच मान रखा है।

अपनी ही आँखों के सामने लगे पर्दों को हटाना, अपने पाखंड को पहचानना और खुद के झूठ को पकड़ना दुनिया का सबसे कठिन काम है। इसलिए, दूसरों के खिलाफ जाना बहुत आसान है, लेकिन अपने ही खिलाफ जाना सबसे मुश्किल काम है।

3. आध्यात्मिक सफलता की अनिवार्य शर्तें: बुद्धि, विवेक और अंतर्दृष्टि

संसार में सफल होने के लिए हमे एक खास तरह की बुद्धि (Intelligence), चतुरता और शारीरिक या मानसिक श्रम की जरूरत होती है। 

लोग दिन-रात मेहनत करके चालाकी से एक दूसरे से आगे निकल जाते है लेकिन अध्यात्म के मार्ग पर केवल इस सतही बुद्धि से काम नहीं चलता। यहाँ आपको कुछ और गहरे और अतिरिक्त आंतरिक गुणों को जगाना पड़ता है।

अध्यात्म में सबसे पहली आवश्यकता है 'विवेक' की। विवेक का अर्थ है वह क्षमता जो आपको यह साफ-साफ दिखा सके कि आप कब और कैसे खुद को धोखा दे रहे हैं। अगर आपके पास विवेक नहीं है तो ये  मनुष्य के दुख का मूल कारण होगा।

हमारा मन बहुत चालाक है; वह अपनी कमियों को छुपाने के लिए तुरंत नए-नए बहाने और तर्क बना लेता है। इस चालाकी को पकड़ने के लिए एक पैनी 'अंतर्दृष्टि' (Insight) की आवश्यकता होती है।

इसके साथ ही, हमारे भीतर सत्य के प्रति एक गहरी निष्ठा होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि जब हमारे सामने अपनी कोई कमजोरी या बुराई आए, तो हम उसे देखकर मुंह न मोड़ें, बल्कि उसे स्वीकार करने की हिम्मत रखें।

 यदि हमारे पास खुद का सच देखने का साहस नहीं है, तो हमारी आध्यात्मिक यात्रा शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगी। फिर चाहे हम बाहरी तौर पर कितने भी खुश दिखने की कोशिश करें लेकिन हमारे मन में हमेशा एक गहरी अशांति होगी और भीतर से हम एक हारे हुए इंसान ही बने रहेंगे।

4. असली और नकली लड़ाई में अंतर

Confused mind

इस पूरी बात को हम एक बहुत ही सीधे और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं। बाज़ार में दो चीजें बिक रही हैं—एक तरफ पाँच रुपये में जहर की पुड़िया मिल रही है और दूसरी तरफ पचास रुपये में अनार का शुद्ध और ताजा रस। 

अब अगर कोई व्यक्ति यह तर्क दे कि अनार का रस बहुत महंगा है और उसमें मेहनत भी ज्यादा लगती है, इसलिए मैं तो पाँच रुपये वाला जहर ही खरीदूँगा, तो आप उसकी बुद्धि पर हंसेंगे। वह पैसे और तात्कालिक श्रम तो बचा रहा है, लेकिन बदले में अपने जीवन को ही दांव पर लगा रहा है।

ठीक यही गणित हमारे जीवन की लड़ाइयों और प्राथमिकताओं पर भी लागू होता है। संसार की जो नकली, ओछी और सतही लड़ाइयाँ होती हैं—जैसे किसी से बदला लेना, ईर्ष्या करना, या सिर्फ दिखावे के लिए धन और संपत्ति इकट्ठा करना—उनमें शुरुआत में बहुत कम श्रम लगता है और वे बड़ी आकर्षक लगती हैं।

 लेकिन उनका अंतिम परिणाम उस 'ज़हर' जैसा होता है जो आपके मानसिक सुकून, आपकी शांति और आपके पूरे जीवन के रस को धीरे-धीरे खत्म कर देता है।

वहीं दूसरी ओर, अपने भीतर के विकारों से लड़ना, अपनी वासनाओं और अज्ञान का सामना करना, अपनी कमजोरियों को देख पाना , यानी 'असली लड़ाई' लड़ना बेहद कठिन लगता है। 

इसमें आपकी पूरी ऊर्जा और संकल्प की जरूरत होती है। यह 'अनार के रस' की तरह महंगा और मुश्किल सौदा लग सकता है, लेकिन इसका परिणाम आपके जीवन को एक ऐसा अमृत, ऐसा आनंद और ऐसी वास्तविक मानसिक सेहत प्रदान करता है जिसे दुनिया की कोई भी ताकत आपसे छीन नहीं सकती।

5. आंतरिक युद्ध की अनिवार्यता: जब तक क्रांति नहीं, तब तक शांति नहीं

Inner peace

सांसारिक संघर्षों की एक अच्छी बात यह होती है कि उनकी एक समय सीमा होती है। जब दफ्तर का समय खत्म होता है या दुकान का शटर गिरता है, तो आपकी व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा कुछ घंटों के लिए थम जाती है। 

जब आप अपने घर लौटते हैं या रात को बिस्तर पर सोने जाते हैं, तो बाहरी दुनिया की रस्साकशी बंद हो जाती है।

लेकिन मन के भीतर चलने वाला युद्ध कभी नहीं थमता; वह चौबीस घंटे, हफ्ते के सातों दिन लगातार चलता रहता है। जब तक आप अपने भीतर बैठे अज्ञान, डर और अहंकार को पूरी तरह से परास्त नहीं कर देते, तब तक आप कहीं भी चले जाएं, आपको सच्ची और स्थायी शांति नहीं मिल सकती । 

हम चाहे कितनी भी कोशिश कर ले खुश रहने की पर वो संभव नहीं हो पाएगा स्थाई रूप से। अक्सर लोग किसी गुरु के वीडियो सुनकर या उनकी बातें पढ़कर कुछ समय के लिए बहुत शांत महसूस करते हैं और सोचते हैं कि उन्हें ज्ञान मिल गया।

लेकिन यह केवल हमारे मन का भ्रम है। वह शांति असली नहीं है, बल्कि वह किसी 'पेनकिलर' (Painkiller) की तरह है जो कुछ समय के लिए हमारे मानसिक दर्द को दबा देती है, लेकिन बीमारी को जड़ से खत्म नहीं करती। 

असली अध्यात्म कोई पेनकिलर नहीं है, बल्कि वह आपके भीतर एक संपूर्ण आंतरिक क्रांति (Inner Revolution) का आह्वान करता है। यह एक ऐसा शंखनाद है जो आपको खुद के ही बनाए हुए झूठे संसार और मान्यताओं से लड़ने के लिए मजबूर करता है। 

और जब आप इस आंतरिक क्रांति की आग में कूदने का साहस दिखाते हैं, तभी आप उस परम आनंद और स्वतंत्रता को उपलब्ध होते हैं, जो जीवन का अंतिम लक्ष्य है।


अतः दुनिया के दबावों से तंग आकर अध्यात्म को एक सुरक्षित छिपने की जगह या 'एस्केप' मत बनाइए। संसार की लड़ाइयों को पूरी समझदारी और जिम्मेदारी के साथ लड़िए, लेकिन साथ ही यह भी याद रखिए कि सबसे बड़ी और वास्तविक विजय खुद पर विजय पाना है। दूसरों को हराना बेहद आसान है, खुद को जीतना ही महाविजय है।

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