नौकरी की गुलामी और मन की आज़ादी


* क्यों हम बिना मन की नौकरी में ज़िन्दगी घिस रहे हैं? -

क्या आपने कभी सोचा है कि हम कोई भी काम, चाहे वह नौकरी हो या कुछ भी, उसे बस करते चले जाते हैं? परन्तु हम अपने आप से यह नहीं पूछते कि मैं यह काम कर क्यों रहा हूँ, क्या इसके बिना मेरी ज़िन्दगी नहीं चल सकती? 

नौकरी की गुलामी और मन की आजादी

हमें यह नौकरी करने में आत्मिक रूप से संतुष्टि नहीं मिलती, परन्तु फिर भी हम अपने आप से यह प्रश्न नहीं पूछते कि वाक़ई इस नौकरी को करना मेरे लिए आवश्यक है क्या? इस प्रश्न को स्वयं से न पूछने के पीछे भी एक कारण है; क्योंकि अगर हम खुद से ही यह प्रश्न पूछने लग जाएँ, तो फिर ज़िम्मेदारी भी खुद पर ही आती है। 

अब तक तो यह नौकरी जैसी भी थी, हम कर ही रहे थे, परन्तु फिर इसे बदलना पड़ेगा और अगर नौकरी बदली, तो उसके साथ स्वयं को भी बदलना पड़ेगा। और अहंकार स्वयं को कभी भी बदलना नहीं चाहता। इसलिए जो जैसा भी चल रहा है, अहंकार उसे वैसा ही रखना चाहता है।

* कैसे हमारी अंधाधुंध इच्छाएँ और दिखावे की संस्कृति हमें गुलाम बनाती है -

हमारी मानसिक असंतुष्टि का मुख्य कारण ही ये दोनों चीजें हैं—एक शरीर और दूसरा समाज। हमारी सारी ज़िन्दगी इन दोनों की इच्छाएँ पूरी करने में निकल जाती है, लेकिन फिर भी हमें आंतरिक शांति नहीं मिल पाती।

 और मिले भी कैसे? ये दोनों ही चीजें वास्तव में हमारी अपनी नहीं हैं; क्योंकि हमारा शरीर तो जंगल के जानवर से आ रहा है, जो उतना ही पुराना है, और हम हर वक्त समाज की बातें मन में लिए घूमते रहते हैं। इन दोनों में एक भी चीज़ ऐसी नहीं है जिसे हम आत्मिक कह सकें, 

और जो चीज़ आत्मिक है, उससे हम अज्ञानता के कारण दूरी बनाए रहते हैं। जिन कामों को करने से हमें वास्तविक शांति मिलती है, उन्हें हम क्षणिक समय के लिए ही करते हैं। इसलिए हम अपनी ज़िन्दगी का मूल हिस्सा इन दोनों की गुलामी में गँवा देते हैं।

* सही काम की पहचान -

सही काम या सार्थक काम की पहचान यह होती है कि वह फिर आपके लिए व्यक्तिगत समय नहीं छोड़ता, वह आपका सारा समय ले लेता है। जब आपको सार्थक काम मिल जाता है, फिर ज़िन्दगी में यह शिकायत नहीं रहती कि 'यार, मेरा काम में मन नहीं लगता।' 

सही काम को करने के बाद अपने अन्दर एक शांति महसूस होती है। एक सही काम का मिलना मेरी नज़र में बहुत बड़ी उपलब्धि है। सही काम को ढूंढने में चाहे आपका समय लग जाए, परन्तु कोई गलत काम कभी मत पकड़ना; क्योंकि गलत काम आपको तन पर कपड़ा और मकान पर छत तो दे सकता है, परन्तु आपको अन्दर से तृप्त नहीं कर सकता। 

चूंकि हम सभी के पास ज़िन्दगी केवल एक ही है और उसे पूरी उम्र जीने में बिताना है, तो कृपया करके कोई गलत राह मत चुन लीजिएगा, नहीं तो अन्त में केवल पछतावा हाथ लगेगा।

जो भी कामअप करो उसको सत्य के केंद्र से संचालित करो तब ही आपको आत्मिक सुख की अनुभूति होगी क्योंकि सत्य ही ईश्वर है

* मन की असली आज़ादी -

क्या आपको पता है कि हमारा मन असली आज़ादी का अनुभव कब करता है? अनुभव तो आपने भी किया होगा, परन्तु आपको याद नहीं है। हमारे मन की असली आज़ादी केवल उस वक्त झलकती है, जब हम निःस्वार्थ होकर कुछ कर्म कर रहे होते हैं;

मन की आजादी

क्योंकि काम हमारे निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर किया गया होता है। चूंकि मन समाज का गुलाम होता है, वह समाज की मान्यताओं पर चलता है, और जब हम समाज की बातों को न मानकर स्वयं के अनुसार चलते हैं, तो हमारे स्वार्थ पर आँच आती है क्योंकि हमारा शरीर स्वार्थी है। परन्तु मेरा मानना है कि इस स्वार्थी शरीर पर लात मारकर वह काम करो, जिसमें तुम्हें आत्मिक आनंद मिलता हो, जो केवल निःस्वार्थ भाव में ही है।


अंत में निष्कर्ष यही निकलता है कि काम वो ही करो जिससे तुम्हारा दिली नाता है और जो दूसरों की मदद करने में सहायक हो , नहीं तो आप उस काम के साथ लंबे समय तक टिक नहीं पाओगे ।

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