१. अशांति का कारण बाहर नहीं, हमारे भीतर है-
असली शांति पाने के लिए सबसे पहले तो यह स्वीकार करना पड़ता है कि इसका ज़िम्मेदार मैं स्वयं हूँ। चूंकि हमारे मन में अज्ञान की मोटी-मोटी परतें चढ़ी हुई हैं, जो सच्चे ज्ञान को कभी भी प्रकट नहीं होने देतीं, फिर हम अज्ञानता में ही अपने फ़ैसले लेते हैं और वही गलत फ़ैसले दुख व अशांति का कारण बनते हैं।
अगर हम वास्तव में आंतरिक शांति पाना चाहते हैं, तो हमें चेतना की उपस्थिति में होश में रहकर निर्णय लेने होंगे, जो आगे चलकर हमें आत्मिक शांति प्रदान करेंगे।
२. इच्छाओं के जाल को पहचानना सीखें-
मैंने आचार्य प्रशांत से सीखा है कि व्यक्ति की इच्छाएं बाहरी दुनिया से हैं। हमारी इच्छाएं मुख्य रूप से दो जगहों से आती हैं: एक 'शरीर' और दूसरा 'समाज'। और सबसे बड़ी बात यह है कि ये दोनों ही हमारी अपनी नहीं होतीं।
अब अगर हम ये इच्छाएं पूरी कर भी देते हैं, तो हमें आत्मिक शांति नहीं मिलती, क्योंकि हमारा शरीर भी प्राकृतिक है और समाज की मान्यताएं भी अपनी नहीं हैं, तो इनसे तो शांति की उम्मीद की भी नहीं जा सकती।
३. सजगता ही असली ध्यान है-
आचार्य प्रशांत सजगता (Awareness) पर बहुत ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार, ध्यान कोई ऐसी क्रिया नहीं है जिसे सुबह १० मिनट कर लिया जाए। वे कहते हैं कि अगर ध्यान वास्तव में इतनी अच्छी चीज़ है, तो क्यों न इसे ज़िंदगी ही बना लिया जाये!
उनके अनुसार, चौबीसों घंटे हम जो भी करते रहते हैं, उसको बस साक्षी भाव के साथ देख लें। जो हमे आत्मज्ञान की ओर ले जाता हैं। और केवल देख लेने मात्र से ही हमारे कर्म का केंद्र बदल जाता है और यही असली ध्यान है।
४. अकेलेपन को एकांत में बदलें-
आज का इंसान अकेले होने से बहुत डरता है। जैसे ही वह अकेला होता है, फोन उठा लेता है या लोगों से घिर जाना चाहता है। और यह अकेलापन ही मन की छटपटाहट और अशांति को जन्म देता है।
आचार्य प्रशांत कहते हैं कि अकेलेपन और एकांत में ज़मीन-आसमान का अंतर है। अकेलापन एक बीमारी है, जिसमें आप को किसी बाहरी वस्तु या व्यक्ति की कमी महसूस होती है। और एकांत इसके ठीक विपरीत है।
एकांत में आप स्वयं के साथ ही मज़े में रहते हैं, आपको किसी बाहरी व्यक्ति की कमी नहीं खलती। और जब आप खुद के साथ समय बिताने लगते हैं, तब आपको वास्तविक आनंद की अनुभूति होती है और आपके मन का बिखराव अपने आप शांत होने लगता है।
५. सत्य और सही कर्म का चुनाव-
हम इसे ऐसे समझ सकते हैं कि एक चोर का मन कभी शांत नहीं हो सकता, क्योंकि उसके कर्म गलत हैं। ठीक इसी तरह जब हम अपने जीवन में ऐसे काम करते हैं जो हमारी अंतरात्मा के खिलाफ हों या केवल समाज की नज़र में ही सही हों, तो हम अन्दर से बिल्कुल खोखले हो जाते हैं और फिर हमारे मन को कभी चैन नहीं मिल सकता।
हम कोई भी काम जब अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनकर करते है तो केवल उसी से हमे आत्मिक शांति का अनुभव होता है। क्योंकि उस पर समाज की थोपी हुई मान्यताएं हावी नहीं हो पाती , और वह कर्म फिर हमारी आत्मा को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त कर पाता है।
निष्कर्ष- अंततः, आचार्य प्रशांत के दर्शन से मैंने यही समझा है कि मन को शांत करने के लिए हमें बाहर भागने की ज़रूरत नहीं है। जब हम अपनी इच्छाओं के प्रति सजग होते हैं और अकेलेपन को एकांत का उत्सव बना लेते हैं, तो शांति कहीं बाहर से नहीं आती, बल्कि हमारे भीतर से ही प्रकट होने लगती है। यह सफर खुद को जानने का है, और शुरुआत हमेशा 'अभी' से होती है



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