हम सब सोचते हैं कि प्यार तो किसी से भी हो सकता है परन्तु ऐसा नहीं होता है क्योंकि प्यार सीखना पड़ता हैं। व्यक्ति यही समझता है कि हम अपने परिवार से, अपने चाहने वालों से प्यार करते हैं; परंतु क्या यह वास्तव में प्यार है या प्यार के नाम पर कुछ और ही है?
पहली बात, प्यार इतनी सस्ती चीज़ नहीं कि इतनी आसानी से मिल जाए। उसके लिए पहले पात्रता अर्जित करनी पड़ती है। श्रम करना पड़ता है अपने ही विरुद्ध। अगर यह सब झेल पाने का सामर्थ्य है हममें, तब जाकर हम प्रेम के काबिल हो पाते है।
1. सच्चे प्रेम की पहचान
आजकल हमारे चारों तरफ प्रेम के नाम पर पता नहीं क्या-क्या चल रहा है। बच्चों से लेकर बड़े तक सब पर प्रेम चढ़ा हुआ है, पर क्या यह वास्तव में प्रेम है?
जब हम दुनिया में देखते हैं, तो हमें अलग-अलग तरह के प्रेम करने वाले लोग मिलते हैं। हमें पता ही नहीं चल पाता कि कौन सा व्यक्ति प्रेम करता है और कौन प्रेम करने का नाटक कर रहा है।
अगर हम वास्तव में खोजना चाहते हैं कि कौन हमारे प्रेम के लायक है और किसे हम प्रेम करें, तो सबसे पहले तो हमें यह देखना पड़ेगा कि जो व्यक्ति हमें प्रेम करने आ रहा है, वह हमें "सुख" दे रहा है या मुक्ति, शांति, सत्य? इसी से उस व्यक्ति की पहचान हो जाएगी।
क्योंकि सच्चा प्रेमी आपका प्रशंसक बनकर नहीं, बल्कि आपका आलोचक बनकर आपके सामने आएगा। क्योंकि उसे आपकी वर्तमान हालत ठीक नहीं लगेगी, तो वह आपकी झूठी प्रशंसा नहीं करेगा बल्कि वह आपकी आलोचना ही करेगा और आपकी कमियाँ ही निकालेगा। इसीलिए वह आपका सच्चा प्रेमी है, क्योंकि उसे स्वार्थ की पूर्ति नहीं करनी है बल्कि आपको आगे बढ़ते हुए, बेहतर होते हुए देखना चाहता है।
2. प्रेम के चार तल
हर व्यक्ति जन्म से एक प्रेमी ही पैदा होता है, बस फ़र्क यह है कि उसका प्यार किस तल का है। क्योंकि आजकल जिसको देखो वही आशिक बना घूम रहा है।
पहला तल: सबसे निचले तल पर वह व्यक्ति आता है जिसे केवल अपने-आप से प्रेम है, अपने-आप से मतलब है, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अगर किसी का नुकसान हो रहा हो तो भी उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उसे केवल अपने "मैं" को संतुष्ट करना पहली प्राथमिकता है। इसमें हर चीज़ में पहले खुद को प्राथमिकता देनी पड़ती है, तो यह प्रथम व सबसे निचले स्तर का प्रेम है।
दूसरा तल: इसके बाद आता है आम सामाजिक, मध्यमवर्गीय परिवार का प्यार, जिसे केवल अपने परिवार व खुद से जुड़े व्यक्तियों का भला ही दिखता है; चाहे उनके भले के लिए दूसरों का नुकसान करना पड़े तो मंज़ूर है। इस दूसरे तल के प्रेम को समाज बड़ी इज़्ज़त देता है।
तीसरा तल: इसके बाद आता है तीसरे तल का प्रेम, जो किसी कवि, किसी वैज्ञानिक या किसी गायक का प्रेम होता है जिसे केवल अपने काम से प्रेम होता है। उसके लिए उसका काम ही पहला आशिक होता है। इस प्रकार के व्यक्ति को इज़्ज़त समाज थोड़ा कम देता है।
चौथा तल: अंत में चौथे तल पर आता है ऋषियों का प्रेम जो आत्मिक होता है अर्थात् निःस्वार्थ होता है। उसमें दूसरे की आजादी पहली प्राथमिकता होती है। यह जो चौथे स्तर का प्रेमी है, इसे ही सच्चा प्रेम मिलता है और यही सच्चा प्रेम कर पाता है।
3. मोह व प्रेम में अंतर
अगर इसे बिल्कुल आसान शब्दों में कहें तो इसका मतलब इतना सा है कि "मोह पिंजरा देता है, जबकि प्रेम आज़ादी।"
जिस भी व्यक्ति को तुमसे मोह है, वह तुम्हें पकड़ना चाहेगा क्योंकि तुमसे उसके स्वार्थ की पूर्ति हो रही है, तो तुमसे पहले उसके स्वार्थ उसकी पहली प्राथमिकता हैं।
जबकि प्रेम में सबसे पहले स्वार्थ की बलि दी जाती है, क्योंकि सच्चा प्रेम वास्तविक रूप से व्यक्तिगत नहीं होता बल्कि आत्मिक होता है, जिसमें दूसरे की आज़ादी पहली प्राथमिकता होती है।
वह हमेशा आपका भला ही चाहेगा, चाहे उसके लिए उसे कभी-कभी तुम्हारे ही विरुद्ध खड़ा होना पड़े। उसे हर हाल में मुक्ति, सत्यता, आज़ादी सबसे ज़्यादा प्यारे होते हैं।
4. पहले खुद को पहचानो, फिर प्रेम करो
अगर वास्तव में प्रेम करने के लिए पहले स्वयं को जानना होता है, तो फिर दुनिया में प्रेम के नाम पर चल क्या रहा है? क्योंकि हर व्यक्ति तो स्वयं को उतना जानता नहीं, सभी आत्मज्ञानी तो हैं नहीं।
इसका मतलब हममें से अधिकतर लोग अज्ञानता के प्रभाव में प्रेम करते हैं, जिसका नतीजा फिर अंत में दुख और बेचैनी के रूप में सामने आता है।
क्योंकि हम किसी भी व्यक्ति या वस्तु से प्रेम करने के लिए पहले अपना तो पता होना चाहिए न! हमें स्वयं अपना ज्ञान नहीं, क्योंकि हम समाज और हमारे शरीर द्वारा संचालित हैं, तो फिर हमारे निर्णय भी वहीं से आते हैं जिनका अंतिम परिणाम दुख ही होता है। इसलिए एक सच्चा प्रेमी होने से पहले आत्मज्ञानी होना पड़ेगा।
5. सच्चे प्रेम का रहस्य
हम लोग या तो समाज द्वारा संचालित हैं या अपने शरीर के गुलाम हैं। तो हमारी पूरी क्रियाएँ हमारे मन (जो समाज द्वारा दी गई मान्यताओं से भरा है) से आती हैं या जंगल से उठकर आए शरीर से, तो इन दोनों की सीमाएँ होती हैं।
परन्तु प्रेम आत्मिक होता है और आत्मा तो अनन्तता की सूचक है, तो फिर इस प्रेम की कोई सीमा नहीं होती। फिर यह अपना रास्ता स्वयं बना लेता है।
अगर आप में किसी कार्य को लेकर कोई रुचि नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपमें सामर्थ्य नहीं है उसे करने की; बल्कि इसका सीधा सा मतलब है कि आपको उस काम से प्रेम नहीं है। वरना प्यार हो तो फिर उसके बिना कुछ चाहिए थोड़ा ही न होता है! क्योंकि वो सच्चा प्यार ही फिर सब कुछ होता है।
निष्कर्ष: अंत में यही कहना चाहता हूँ कि पहले आत्मज्ञान आता है, फिर एक आत्मज्ञानी ही सच्चे प्रेम के काबिल होता है। और वो सच्चा प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है।



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